मौलिक काल्पनिक कहानी — वास्तविक घटना नहीं।
इमरान ने सफेद घोड़ी की पीठ पर लाल मखमल डाला और किनारे की उधड़ी झालर भीतर मोड़ दी। गली के नल से पानी बहकर खुरों के पास आ रहा था। उसने घोड़ी को सूखी तरफ किया, फिर पेटी के नीचे हाथ फेरकर देखा। सामने टीन की पेटी पर साफा, नकली मोतियों की माला और बुकिंग की परची रखी थी। परची पर उसके पिता की लिखावट में था—‘चढ़ाई साढ़े आठ बजे, आतिशबाजी घोड़ी से दूर।’ आखिरी तीन शब्दों के नीचे दो लकीरें थीं।
पिता के मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद यह पहली बुकिंग थी जिसे इमरान अकेले ले जा रहा था। उन्नीस साल का हो गया था, फिर भी ग्राहक पूछते, “अब्बा नहीं आएँगे?” वह कहता, “काम मैं रोज ही करता हूँ।” आज बाकी के चार हजार मिलने थे। उनमें से पंद्रह सौ सोमवार को मोटर-मिस्त्री के प्रशिक्षण की फीस में देने थे। वह उम्र भर शादी के मौसम का इंतजार नहीं करना चाहता था।
घोड़ी का नाम केसर था। किराए के दो कमरों के पीछे उसके लिए छप्पर था। इमरान सुबह चारा डालता, जगह साफ करता और खाली सड़क पर उसे चलाता था। वह जानता था कि बस के हॉर्न पर केसर केवल कान घुमाती है, मगर पास फूटते पटाखे पर पूरा बदन कस लेती है। पिछली सर्दी एक बार वह उलटे कदम चलने लगी थी। तब पिता ने दूल्हे को उतरवा दिया था; ग्राहक ने पाँच सौ काटे थे।
पिता दरवाजे की चौखट पर बैठे बोले, “महेश हलवाई की लड़की है। हिसाब साफ रखना।”
“परची साथ है।”
“परची दिखाने से पहले बात करना। आदमी शादी में बात कम सुनता है।”
इमरान ने जवाब नहीं दिया। पिता से यह भी नहीं कहा कि फीस के लिए रखे सात सौ रुपये कल चारे वाले को देने पड़े थे। उसने मखमल का ढीला कोना फिर ठीक किया और केसर को लेकर बाजार की ओर चला।
महेश का घर पुरानी तहसील के पीछे था। गली में हलवाई की भट्ठी अभी जल रही थी। कड़ाहियाँ किराए की थीं; हर एक के हत्थे पर सफेद रंग से नंबर लिखा था। लड़के बर्फ की सिल्ली उतार रहे थे। महेश हल्दी लगी बनियान पर कमीज पहनते हुए एक आदमी को पत्तलों का पैसा दे रहा था।
“साढ़े आठ कहा था,” उसने इमरान को देखते ही कहा।
“अभी आठ बीस हैं।”
महेश ने घड़ी देखी, फिर केसर की झालर। “इसके माथे वाला फूल टेढ़ा है। फोटो सामने से आएगा।”
इमरान ने फूल सीधा किया। बगल में जनरेटर खाँसा तो केसर ने सिर उठाया। वह उसे थोड़ा आगे, खाली ठेले के पास ले गया। तभी पीली कमीज वाला लड़का आतिशबाजी का गत्ता रख गया।
“यहाँ नहीं,” इमरान ने कहा। “घोड़ी चढ़ने के बाद भी दूर चलाना।”
लड़का बोला, “हमको पीछे रहने को कहा है। तुम अपनी देखो।”
महेश ने दोनों को सुन लिया। “चौराहे पर चलेंगे। यहाँ जगह कहाँ है?” फिर वह इमरान के पास आकर धीमे बोला, “थोड़ा निभा लेना। समधी कस्बे के बाहर से आए हैं। पहली लड़की है।”
इमरान ने सिर हिलाया। उसे महेश की दुकान याद थी—सुबह जलेबी के सामने खुद बैठता था, दोपहर में कारीगर की जगह कड़ाही सँभालता था। आज उसकी कमीज की जेब में नोट अलग-अलग तहों में रखे थे। हर भुगतान पर वह कोई दूसरी तह खोलता था।
दूल्हा आया तो इमरान ने उसे चढ़ने में मदद की। लड़के ने पूछा, “अचानक भागेगी तो नहीं?”
“आप तनकर मत बैठिए। लगाम मैं पकड़े हूँ।”
बैंड शुरू हुआ। केसर ने दो कदम छोटे रखे, फिर इमरान के साथ चलने लगी। गली से निकलते हुए वह हर मोटरसाइकिल और नीचे लटके तार को देखता रहा।
चौराहे पर बारात रुक गई। आगे नाचने वालों ने घेरा बना लिया था। पीछे से स्कूटर वाले रास्ता माँग रहे थे। इमरान केसर को किनारे कर ही रहा था कि उसके पीछे तीन तेज धमाके हुए। घोड़ी उछली नहीं, लेकिन गर्दन ऊँची करके तेजी से बगल हटी। दूल्हे ने काठी का अगला हिस्सा पकड़ लिया।
“बंद करो!” इमरान चिल्लाया। उसने लगाम झटकी नहीं; घोड़ी को भीड़ से हटाकर बंद दवा-दुकान के सामने लाया। वहाँ शटर के पास थोड़ी जगह थी। बैंड बजता रहा।
दूल्हा बोला, “भाई, उतार दो।”
इमरान ने पास खड़े दो आदमियों की मदद से उसे उतारा। केसर की नथुने फूल रहे थे। वह सड़क की ओर देखती, फिर पैर बदलती। इमरान उसके पास खड़ा रहा और लोगों से थोड़ा पीछे हटने को कहता रहा।
महेश पहुँचा तो उसके साथ दूल्हे का चाचा भी था। चाचा बोला, “घोड़ी ऐसी ही थी तो पहले बताते। अभी दरवाजे तक आधा किलोमीटर है।”
इमरान ने परची निकाली। महेश ने पढ़े बिना उसका हाथ नीचे कर दिया। “अब कागज रहने दो। पटाखे आगे करा देते हैं।”
“आवाज तो यहीं आएगी।”
“तो क्या बारात पैदल जाएगी?”
इमरान चुप रहा। फीस की आखिरी तारीख सोमवार थी। अगला बैच छह महीने बाद लगना था। उसने सोचा, दस मिनट और चल जाए तो पैसे मिल जाएँगे। केसर अब स्थिर खड़ी थी। मगर पीली कमीज वाला लड़का अगला गत्ता खोल रहा था।
“बिना पटाखे के चढ़ा दूँगा,” उसने कहा। “नहीं तो अब नहीं।”
महेश का चेहरा कस गया। “सब इंतजाम मैंने अकेले नहीं किया है। लड़के वालों की भी बात है।”
दूल्हे ने अपना साफा सँभालते हुए कहा, “मैं पैदल चल लूँगा।”
चाचा ने उसे देखा। “तुम रहने दो।” फिर इमरान से बोला, “आधी बुकिंग के पूरे पैसे नहीं मिलेंगे।”
महेश ने विरोध नहीं किया। इमरान ने परची वापस जेब में रख ली। “जो हिसाब हो, लिख देना।”
बारात आगे बढ़ गई। इमरान दूसरे रास्ते से केसर को घर छोड़ आया। रात साढ़े ग्यारह बजे वह हिसाब लेने लौटा। दरवाजे पर दूल्हे के जूते खोजे जा रहे थे। महेश रसोई के पीछे खाली दूध की केनों के पास बैठा था।
उसने दो हजार रुपये बढ़ाए। “दो हजार कटेंगे।”
“दूरी आधी भी नहीं थी।”
“तो वापस चढ़ा देते। हमने मना किया था?”
इमरान नोट लेने से पहले खड़ा रहा। भीतर से किसी ने महेश को पुकारा। उसने थके स्वर में कहा, “बैठो, अभी आया।” इमरान नहीं बैठा। महेश लौटकर आया तो उसके हाथ में दो सौ रुपये और थे।
“इतना और रखो। गाजे-बाजे वाले को भी देना है।”
इमरान ने रुपये गिने। “परची पर बाकी काटा हुआ लिख दीजिए।”
महेश ने पेन माँगा, घुटने पर परची रखी और लिखा। नीचे दस्तखत करके बोला, “तुम्हारी बात गलत नहीं थी। पर मेरी भी रात खराब हुई।”
“मेरी फीस रह जाएगी,” इमरान के मुँह से निकल गया। फिर उसे अपने कहने पर झेंप हुई। उसने परची मोड़ी और चला आया।
घर पर पिता सोए नहीं थे। उन्होंने रकम सुनी, फिर पूछा, “उतरते समय कोई गिरा तो नहीं?”
“नहीं।”
पिता ने और कुछ नहीं पूछा। इमरान ने चारे और घर के पैसे अलग किए। फीस के लिए आठ सौ बचे। उसने प्रशिक्षण केंद्र का पर्चा उठाया, पीछे बची रकम लिखी और उसे दीवार की कील पर फिर टाँग दिया।
सुबह केसर अपना चारा खा रही थी। इमरान लाल मखमल लेकर चौखट पर बैठा। जहाँ झालर उधड़ी थी, वहाँ सुई अटक रही थी। उसने कपड़ा पलटकर पुराने टाँके खोले और नई सिलाई के लिए धागा दुहरा कर लिया।
Voice of Paws — Stray Insight Foundation के सहयोग से। यह मौलिक काल्पनिक कहानी है, वास्तविक घटना नहीं। सामग्री में AI की सहायता ली जा सकती है। चित्र AI द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र है।