मौलिक काल्पनिक कहानी — वास्तविक घटना नहीं।
सरोज ने खुरपी का सिरा दीवार की दरार में लगाया तो भीतर से सूखी घास का एक तिनका बाहर आया। उसने समझा, चूहे का बिल होगा। चूना झड़ते ही आले के अँधेरे में दो पीली चोंचें खुल गईं। सरोज का हाथ रुक गया। पीछे सिलाई मशीन पर बैठे बशीर ने बिना सिर उठाए पूछा, “ईंट बैठेगी उसमें?” बाहर बिजली के तार पर बैठी मैना लगातार बोल रही थी। सरोज सीढ़ी से एक पायदान नीचे उतरी और बोली, “अभी देखती हूँ।”
कस्बे की अनाज मंडी के पीछे बशीर की सिलाई की दुकान थी। सामने खुली नाली, ऊपर टीन का छज्जा और दरवाजे के पास स्कूल की वर्दियों का फीका बोर्ड। बगल की दुकान खाली हुई तो उसने किराए पर ले ली थी। बीच की दीवार में दरवाजा निकल चुका था। अब दोनों दुकानों का पलस्तर और रंग एक जैसा होना था।
सरोज ने पहली बार अपने नाम से पूरा ठेका लिया था—नौ हजार रुपये, सामान अलग। अब तक वह दूसरे मिस्त्रियों के साथ दिहाड़ी करती आई थी। उसके पति के छोड़े औजारों पर जंग चढ़ गई थी; उसने उन्हें साफ किया, दो नई कूचियाँ खरीदीं और हिसाब की कॉपी पर अपना नाम लिखा। इस ठेके की बचत से पुरानी साइकिल लेनी थी। रोज काम पर पहुँचने में आठ रुपये और आधा घंटा लगता था।
आले को बंद करना भी उसी हिसाब में था। बरसों पहले वहाँ लकड़ी की पट्टी पर रेडियो रखा जाता था। पीछे की दीवार टूटी तो बाहर से आने का रास्ता बन गया। मैना ने उसी में घोंसला बनाया था। सरोज ने ठेका लेते समय बाहर से घास देखी थी, मगर कहा कुछ नहीं। खाली घोंसला समझ लेना उसके लिए सुविधाजनक था।
“चिड़िया के बच्चे हैं,” उसने आखिर कहा। बशीर ने मशीन रोक दी। “कितने दिन लगेंगे?” “यह नहीं जानती।” “मंगलवार को कपड़े काटने की मेज आ जाएगी। फिर पीछे कैसे काम करोगी?”
उसके पास जवाब नहीं था। वह सीढ़ी हटाकर दूसरी दीवार खुरचने लगी। कुछ देर बाद मैना चोंच में कीड़ा दबाए आई। दुकान के भीतर दो बार झाँका, फिर आले में चली गई। बशीर ने मशीन का पहिया हाथ से घुमाया और धागा सुई में डालने लगा।
दोपहर में बशीर की पत्नी नसीमा खाना लाई। उसने घोंसले की बात सुनी तो बोली, “आला छोड़कर बाकी कर दो। इतने छोटे काम पर दुकान थोड़े रोकेंगे।” “पट्टी और रंग बाद में अलग दिखेगा,” सरोज ने कहा। “तो अलग दिखे। अभी किराया दोनों का जा रहा है।”
बशीर को यह मंजूर नहीं था। नई दुकान के लिए उसने बहन से उधार लिया था। दो लड़के काम सीखने आने वाले थे। पुरानी दुकान में ग्राहक की नाप लेते समय दूसरे को बाहर खड़ा होना पड़ता था। वह नई जगह को आधा बना छोड़कर खोलना नहीं चाहता था।
“बच्चे कहीं और रख दो, माँ ढूँढ़ लेगी,” उसने कहा। सरोज ने सिर हिलाया। “ऐसे रख देने से काम नहीं चलेगा।” “फिर पहले बताया होता। मैंने और मिस्त्री को मना किया है।”
वह बात उसे लगी, क्योंकि सही थी। उसने खुरपी से जमे चूने को कुरेदा। “घास दिखी थी। भीतर नहीं देखा था।” बशीर कुछ देर उसे देखता रहा। फिर बोला, “जल्दी में ठेका तुमने भी लिया, अकेले मैं नहीं हूँ।”
शाम को सरोज घर गई तो बेटे ने साइकिल वाले का संदेश दिया। रविवार तक पैसे नहीं दिए तो वह साइकिल किसी और को बेच देगा। सरोज ने कॉपी खोली। उसी के पीछे अगले काम का पता लिखा था—बस अड्डे पर दवा की दुकान, सोमवार से चार दिन। वहाँ समय पर पहुँचना जरूरी था।
उसने हिसाब में एक नई पंक्ति खींची। बशीर की दुकान पर दोबारा लौटना पड़ा तो दवा की दुकान का काम नहीं ले सकेगी। वह देर तक पेंसिल पकड़े बैठी रही। फिर साइकिल वाले को कहलवा दिया कि कोई ग्राहक मिले तो रोकना नहीं।
अगली सुबह उसने बशीर के सामने बात रखी। “आले वाली पट्टी छोड़ दूँगी। बाकी पूरा कर दूँगी। मेज को अभी सामने रखवा लो। बच्चे निकल जाएँ तो लौटकर इसे बंद करूँगी। लौटने की मजदूरी नहीं लूँगी।” “और दुकान बार-बार समेटने की मजदूरी मेरी?” बशीर ने पूछा।
दोनों में काफी देर तक पैसों की बात हुई। नसीमा कपड़ों की गठरी पर बैठी सुनती रही। आखिर तय हुआ कि सरोज ठेके में से पाँच सौ रुपये छोड़ेगी; आखिरी पंद्रह सौ काम पूरा होने पर मिलेंगे। मेज की जगह बदलवाने और कपड़े ढकने का खर्च बशीर उठाएगा। उसने अनमने ढंग से कहा, “काम साफ चाहिए। बाद में यह मत कहना कि पुराना रंग मिल नहीं रहा।”
सरोज ने हामी भरी, लेकिन घर लौटते समय उसे अपने ही प्रस्ताव पर गुस्सा आया। पाँच सौ रुपये बहुत थे। बशीर चाहता तो उतना छोड़ सकता था। फिर उसे याद आया कि आले की घास उसने भी देखी थी। उसने चाल तेज कर दी।
अगले तीन दिन उसने पहले दूर की दीवारें तैयार कीं। आले के पास न धूल उड़ाई, न रंग लगाया। वहाँ तक जाने वाला रास्ता खुला रखा। मैना शुरू में दरवाजे पर लोगों के हटने की प्रतीक्षा करती; फिर मशीनों की आवाज के बीच भी भीतर आने लगी। उसका जोड़ा बाहर छज्जे से उतरता और दोनों बारी-बारी खाने के छोटे टुकड़े लाते।
नई दुकान खुल गई। नसीमा ने तैयार कपड़ों के लिए रस्सी दूसरी ओर बाँध दी। एक ग्राहक ने उधड़ी पट्टी देखकर पूछा, “मिस्त्री भाग गया क्या?” बशीर ने कैंची चलाते हुए कहा, “काम बाकी है।” सरोज बाहर बाल्टी धो रही थी। उसने सुना, पर भीतर नहीं गई।
दिन अनुमान से ज्यादा लगे। सरोज को बीच में छोटे-मोटे काम मिले, लेकिन दवा की दुकान का ठेका दूसरे के पास चला गया। वह हर तीसरे दिन बशीर की दुकान के सामने रुकती। एक सुबह एक बच्चा आले के किनारे दिखाई दिया। उसके पंख पूरे थे, पर सिर पर रोएँ बचे थे। सरोज बिना रुके आगे चली गई।
चार दिन बाद बशीर खुद उसके घर आया। “अब भीतर आवाज नहीं आती। बाहर दोनों छोटे तार पर बैठे हैं।” सरोज ने कहा, “कल भी देख लेना।” “देख लूँगा। मेज फिर खिसकानी है।”
दो दिन निगरानी के बाद सरोज सीढ़ी लेकर पहुँची। उसने खाली आले से पुरानी घास निकाली। भीतर मिट्टी, पंख और कपड़े का नीला धागा था। नसीमा ने पहचान लिया, “यह तो हमारे कतरन के ढेर से गया होगा।”
ईंट बैठी, पलस्तर हुआ। सूखने के बाद रंग मिलाने में सरोज को आधा दिन और लगा। बशीर ने बची रकम गिनकर दी। उसने नोट कॉपी के बीच दबाए और मेज का एक सिरा पकड़ लिया। दोनों ने उसे दीवार से सटाया। बाहर छज्जे पर मैना उतरी; भीतर बशीर ने कपड़ा फैलाया और सरोज ने फर्श पर गिरा आखिरी तिनका उठा लिया।
Voice of Paws — Stray Insight Foundation के सहयोग से। यह मौलिक काल्पनिक कहानी है, वास्तविक घटना नहीं। सामग्री में AI की सहायता ली जा सकती है। चित्र AI द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र है।