मौलिक काल्पनिक कहानी — वास्तविक घटना नहीं।
रघुनाथ ने गाड़ी की आखिरी कतार में चार ईंटें और जमाईं, फिर पहिए के आगे रखा पत्थर हटाया। धूसर गधी ने गरदन आगे की, साज की पट्टियाँ तनीं, मगर पहिया कच्ची नाली के किनारे अटक गया। उसने दोबारा जोर लगाया तो रघुनाथ ने लगाम ढीली छोड़ दी। नीचे झुककर देखा—रात भर की सीलन में पहिया उँगली भर धँस गया था। भट्ठे का मुनीम अपनी चौकी से बोला, “पीछे से धक्का लगा लो। आज सबको जल्दी है।” रघुनाथ ने ईंटों की ऊपरी कतार देखी। कल तक वह इतनी ऊँची गाड़ी नहीं भरता था।
कस्बे के बाहर नहर की पटरी पर उसका दो कोठरियों का घर था। सामने साइकिलों में हवा भरने की छोटी दुकान खोलने के लिए उसने पुराना पंप और औजार खरीद रखे थे। दुकान की जगह का पंद्रह सौ रुपये बयाना आज देना था। गाड़ी चलाते हुए उसके घुटने दुखने लगे थे; वह चाहता था कि बरसात आने से पहले बैठकर करने वाला कुछ काम जम जाए।
ईंट ढुलाई में पहले फेरे का पैसा मिलता था। अब मुनीम ने हजार ईंट का हिसाब बाँध दिया था। उसका कहना था कि छोटी-बड़ी गाड़ियों को एक दर देना मालिक को मंजूर नहीं। बड़ी गाड़ियों वाले खुश थे। रघुनाथ ने विरोध किया तो मुनीम ने बही उसकी ओर घुमा दी थी। “तुम्हें जितनी ढोनी हों, ढोओ। रोक कौन रहा है?”
उसने चार ईंटें उतारीं, फिर आठ और। पास खड़े लड़के से धक्का लगवाया। गाड़ी चली तो गधी के छोटे खुर पकी ईंटों की किरचों पर सावधानी से पड़े। उसे रघुनाथ ने चंपा नाम दिया था, लेकिन काम के समय बस जीभ से टिटकारी भरता। वह रास्ता पहचानती थी और चौराहे की सब्जी की दुकान पर अपने आप धीमी हो जाती थी, जहाँ कभी-कभी गिरी हुई पत्तियाँ मिल जाती थीं।
आज ईंटें विमला के नए मकान पर जानी थीं। विमला सिलाई करती थी। आठ साल किराए में रहने के बाद उसने नाली के उस पार छोटी जगह खरीदी थी। मिस्त्री सुबह से बैठे थे; दीवार आज ऊपर न उठी तो वे दूसरे काम पर चले जाते। उसने कल ही रघुनाथ से कहा था, “भैया, दो दिन की मजदूरी खाली चली गई तो मेरा दरवाजा फिर अगले महीने लगेगा।”
पहली खेप ठीक पहुँची। लौटते हुए रघुनाथ ने चंपा को नीम के नीचे रोका, साज ढीला किया और अपनी गठरी से सूखी घास निकाली। खुद रोटी खाने बैठा ही था कि विमला का भतीजा साइकिल पर आ गया। “बुआ कहती हैं, अगली बार ज्यादा लाना। मिस्त्री मसाला बना चुके हैं।” रघुनाथ ने आधी रोटी कपड़े में लपेट दी।
दूसरी खेप में उसने फिर ऊँची कतार लगा दी। भट्ठे से निकलने पर रास्ता समतल था, मगर टूटी पुलिया के पास मिट्टी चढ़ाकर बनाई गई ढलान आती थी। वहाँ चंपा की चाल छोटी पड़ने लगी। रघुनाथ पीछे से गाड़ी ठेलने लगा। पहिया एक गड्ढे में उतरा और गधी ठिठक गई। उसने कान पीछे किए, फिर सिर मोड़कर गाड़ी की तरफ देखा।
रघुनाथ के हाथ में पतली बाँस की छड़ी थी, जिसका इस्तेमाल वह प्रायः पहिए में फँसा कचरा निकालने को करता था। उसने छड़ी उठाई, फिर गाड़ी के नीचे खोंस दी। रास्ते से निकल रहे ट्रैक्टर वाले ने आवाज लगाई, “दो लगाओ, चल पड़ेगी!” रघुनाथ ने उत्तर नहीं दिया। वह चंपा को किनारे की समतल जमीन पर लाया और गाड़ी रोककर उसके कंधे के पास की पट्टी जाँची। पसीने से बाल चिपक गए थे।
विमला का भतीजा फिर आ पहुँचा। उसने गाड़ी देखी और बोला, “इतनी देर में तो पहुँच जाते।” रघुनाथ ने उससे पहिए के पीछे पत्थर लगाने को कहा। फिर सड़क के सूखे किनारे ईंटें उतारने लगा। लड़का खड़ा देखता रहा। “ये यहाँ छोड़ोगे?” “अभी के लिए।” “कोई उठा ले गया तो?” रघुनाथ ने एक और ईंट नीचे रखी। “तू दस मिनट बैठ सकेगा?”
हल्की गाड़ी लेकर वह मकान पर पहुँचा तो मिस्त्री धागा ताने खड़ा था। विमला ने ईंटें गिनते हुए पूछा, “बाकी कहाँ हैं?” बात सुनकर उसका चेहरा कस गया। “तुमने कल कहा होता तो मैं मोटर वाली ठेली कर लेती। अब दोपहर में कौन आएगा?”
“कल मुनीम ने नया भाव नहीं बताया था।” “उसका हिसाब तुम जानो। मैंने तुमसे पूरे काम की बात की थी।” उसकी बात गलत नहीं थी। रघुनाथ ने भी पैसे की जरूरत देखकर हामी जल्दी भरी थी। उसने ईंट उतारने की जगह फावड़ा पड़ा देखा और चुपचाप किनारे कर दिया।
विमला भीतर से अपना कपड़े का बटुआ लाई। उसमें तह किए नोटों के बीच दर्जिन की चाक का छोटा टुकड़ा था। “मेरे पास ऊपर से देने को बस दो सौ हैं। मोटर ठेली वाला छह सौ माँग रहा है। तुम चार फेरे और कर सकते हो?”
रघुनाथ ने आँगन के बाहर खड़ी चंपा को देखा। वह पिछला एक पैर ढीला छोड़कर खड़ी थी। चार फेरे करते-करते अँधेरा हो जाता; रास्ते की बाकी ईंटें भी उठानी थीं। दुकान का मालिक शाम तक बयाना न मिलने पर जगह दूसरे को देने वाला था।
“आज दो फेरे करूँगा। बाकी कल सुबह। चाहो तो मेरा आज का पैसा रोक लो।” विमला ने बटुआ बंद कर लिया। “पैसा रोकने से दीवार नहीं उठेगी।” कुछ देर बाद उसने मिस्त्री से पूछा कि बची ईंटों से कितना काम हो सकता है। मिस्त्री ने अधूरी चौखट नापी। “सामने की छोड़कर पीछे की दीवार ले लेंगे। मगर कल सुबह माल चाहिए।” विमला ने रघुनाथ की ओर देखा। “पहले मेरे यहाँ आना। भट्ठे का दूसरा काम मत पकड़ लेना।”
तीसरे फेरे में रघुनाथ रास्ते की ईंटें भी उठा लाया। हर बार कम भरने से शाम तक उसकी कमाई के तीन सौ साठ रुपये घट गए। घर लौटने से पहले वह दुकान की जगह वाले लाला के पास गया। बारह सौ रुपये मेज पर रखकर बोला, “बाकी तीन दिन में।” लाला ने पैसे गिने, फिर लौटा दिए। “मैंने भी सामने वाले को जवाब देना है। पूरे हों तो सुबह पूछ लेना।”
घर पर पत्नी ने औजारों की बोरी के पास रखे नोट देखे। “जगह नहीं मिली?” उसने सिर हिलाया। वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “कल मैं भी चलूँगी। ईंट उतार दूँगी तो एक चक्कर जल्दी होगा।” रघुनाथ ने कहना चाहा कि उसके अपने घर का काम कम नहीं था, पर कहा केवल, “सुबह जल्दी निकलेंगे।”
अगले दिन विमला के यहाँ पहुँचने तक मिस्त्री नहीं आया था। उसने दरवाजा खोला और बिना गिने ईंटें रखवा लीं। लौटते समय रघुनाथ ने गाड़ी की बगल पर कोयले से एक निशान खींचा। पत्नी अगली कतार लगाने लगी तो उसने हथेली वहीं रख दी। उसने दो ईंटें वापस ढेर पर रख दीं। चंपा ने जमीन सूँघी, और ढीली लगाम के साथ गाड़ी चल पड़ी।
Voice of Paws — Stray Insight Foundation के सहयोग से। यह मौलिक काल्पनिक कहानी है, वास्तविक घटना नहीं। सामग्री में AI की सहायता ली जा सकती है। चित्र AI द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र है।