मौलिक काल्पनिक कहानी — वास्तविक घटना नहीं।
देवकी ने पीतल की नली का मुँह बाल्टी की तरफ किया और पंप का हत्था दबाया। पानी की धार पहले टेढ़ी निकली, फिर सीधी हो गई। नली के जोड़ से दो बूँदें उसकी चप्पल पर गिरीं। उसने रबर का छल्ला कस दिया। सामने महेंद्र की छह बीघे सरसों में पीले फूलों के बीच कहीं-कहीं काली माहू जमी थी। मेंड़ पर झुककर उसने एक टहनी देखी; उँगली लगाए बिना भी चिपचिपाहट दिखाई देती थी। पीछे से महेंद्र ने पुकारा, “पहले नहर वाली पट्टी करना। उधर ज्यादा है।”
देवकी ने अभी दवा की बोतल नहीं खोली थी। खेत के दूसरे सिरे से लगातार भनभनाहट आ रही थी। शीशमों के नीचे लकड़ी के चौदह बक्से रखे थे। कुछ के ढक्कनों पर ईंटें थीं, कुछ पर पुरानी टाइलें। मधुमक्खियाँ उनके छोटे मुहानों से निकलकर फूलों पर जा रही थीं। उसने खाली पंप उतार दिया।
“ये कब आए?”
महेंद्र ने एक नजर उधर डाली। “परसों रात। रऊफ के हैं। चार दिन में ले जाएगा।”
“तुमने बताया नहीं।”
“तुमने पूछा था कि रास्ता खुला है कि नहीं। रास्ता खुला है।”
देवकी को याद आया, उसने पूछा भी यही था। दुकान पर दवा लेते समय दुकानदार ने कहा था कि फूलों पर मधुमक्खियाँ हों तो लेबल जरूर देख लेना। उसे जल्दी थी। उसने सिर हिला दिया था, जैसे यह सब पहले से जानती हो।
पंप उसने सत्रह हजार का खरीदा था। आधा पैसा स्वयं सहायता समूह से लिया, बाकी पति की बची मजदूरी से। पति अभी भी उसे दूसरों के खेतों में निराई करने लौट जाने को कहता था। छिड़काव के काम में दिहाड़ी से कुछ ज्यादा बचता था, मगर दवा, हवा और फसल पहचानने की जिम्मेदारी भी उसी की होती थी। इस हफ्ते की कमाई से पंप की पहली किस्त जानी थी।
महेंद्र का काम तीन दिन पहले तय हुआ था। देवकी ने दो सौ रुपये पेशगी लिए थे और उस दिन के लिए दूसरे गाँव का काम मना कर दिया था। अब वह बोतल हाथ में लिए खड़ी रही। उस पर मधुमक्खियों के लिए चेतावनी साफ छपी थी।
रऊफ बक्सों के पीछे बोरी पर बैठा खाली चौखटें साफ कर रहा था। देवकी को देखकर वह उठा। उसकी आस्तीनों पर मोम चिपका था।
“आज छिड़काव होगा?” उसने पूछा।
“इसीलिए आई हूँ।”
वह महेंद्र की ओर मुड़ा। “भैया, मैंने रखते समय कहा था, दवा से पहले खबर कर देना।”
महेंद्र ने कमर से गमछा खोला। “खबर अभी मिल गई। मेरी सरसों देखो। तुम्हारे शहद के चक्कर में तेल भी छोड़ दूँ?”
रऊफ चुप हो गया। उसने बक्से यहाँ मुफ्त नहीं रखे थे। महेंद्र को बारह सौ रुपये दिए थे। खेत में फूल भी खूब थे और सड़क से गाड़ी अंदर आ सकती थी। दूसरी जगह खोजने में दिन लगता, गाड़ी का भाड़ा अलग।
देवकी ने पूछा, “आज बक्से हट सकते हैं?”
“दिन में कैसे? आधी मक्खियाँ खेत में हैं। लौटेंगी तो बक्से कहाँ ढूँढ़ेंगी?” उसने मुहाने के पास उतरती एक मक्खी की तरफ देखा। उसकी पिछली टाँगों पर पीला पराग जमा था। “रात को ले जा सकता हूँ। जगह मिले तो।”
महेंद्र ने कहा, “रात को बक्से उठाओ, कल सुबह दवा डालो। इसमें इतनी पंचायत क्या है?”
देवकी ने लेबल फिर पढ़ा। फिर उसने दुकान पर फोन लगाया। दुकानदार बोला, “शाम को कर दो।” लेकिन मधुमक्खियों वाली चेतावनी पूछने पर उसने कृषि केंद्र का नंबर दे दिया। वहाँ के कर्मचारी ने दवा का नाम सुना, फूलों की हालत पूछी और कहा कि अभी छिड़काव रोककर पहले खेत दिखाएँ। केवल शाम होने से खतरा खत्म नहीं होगा।
महेंद्र ने उसकी बात पूरी होने से पहले हाथ बढ़ाया। “फोन दो, हम बात करेंगे।”
बात के बाद उसने फोन लौटा दिया। “आदमी दो बजे आएगा। तब तक मजदूरी बढ़ती रहेगी तुम्हारी?”
“बैठने का पैसा नहीं लूँगी,” देवकी ने कहा। कहते ही उसे लगा, यह बात कुछ जल्दी निकल गई।
दो बजे तक हवा तेज हो गई। देवकी ने अपना खाना मेंड़ पर खाया। रऊफ पास के गाँव में बक्से रखने की जगह पूछने गया था। महेंद्र घर नहीं गया। वह खेत में चलता रहा और माहू लगी टहनियाँ तोड़कर एक जगह डालता रहा।
कृषि केंद्र का सहायक मोटरसाइकिल से आया। उसने कई जगह पौधे देखे। बीच का बड़ा हिस्सा अभी कम प्रभावित था; नहर वाली पट्टी में कीट ज्यादा थे। उसने कुछ टहनियों पर माहू के बीच छोटे लाल-काले भृंग भी दिखाए। महेंद्र ने पहली बार उन्हें ध्यान से देखा, फिर पूछा, “तो ये पूरा खेत साफ कर देंगे?”
“ऐसा वादा नहीं है,” सहायक ने कहा। उसने जरूरत वाली पट्टी अलग बताई और फूलती फसल के लिए स्वीकृत उपाय तथा सावधानियाँ लिख दीं। खरीदी हुई दवा वापस करने को कहा। हवा थमे बिना काम नहीं होना था।
देवकी ने पर्ची मोड़कर रख ली। अब केवल डेढ़ बीघे का काम बचा था। महेंद्र ने उसी हिसाब से मजदूरी जोड़ी।
“पूरा दिन तुम्हारे लिए छोड़ा था,” वह बोली।
“मैंने छह बीघे बुलाया था। छह के पैसे दूँ और काम डेढ़ का हो?”
दोनों कुछ देर खड़े रहे। फिर महेंद्र ने सौ रुपये और रखे। “आने-जाने के। इससे ज्यादा नहीं।”
देवकी का जी हुआ पंप उठाकर चली जाए। दूसरी मजदूर होती तो शायद वह भी यही हिसाब लगाती। फिर भी हिसाब सामने पड़ने पर अपमान जैसा क्यों लगता था? उसने रुपये नहीं उठाए। बोली, “काम होने पर देना।”
रऊफ को ईंट-भट्ठे के पीछे बेर वाले खेत में जगह मिली। रात को उसका भतीजा माल ढोने वाला छोटा वाहन लाया। मक्खियों के लौटने के बाद दोनों ने जालीदार मुहाने लगाए, पट्टियाँ कसीं और बक्से चढ़ाए। देवकी अपने खाली पंप के साथ वहीं थी। लौटते वाहन में वह कस्बे तक गई और बंद बोतल दुकानदार को वापस दी। दुकानदार ने रसीद माँगी; उसे थैले की तह से निकालने में देर लगी।
अगली सुबह हवा शांत थी। नई सलाह के अनुसार काम छोटा था, पर तैयारी पूरी करनी पड़ी। महेंद्र ने खुद रस्सी खींचकर पट्टी की हद दिखाई। इस बार उसने बीच से रास्ता काटने को नहीं कहा।
काम खत्म होने पर उसने तय रुपये देवकी की हथेली पर रखे। पूरी किस्त के लिए अभी तीन सौ कम थे। उसने नोट गिने, फिर पंप साइकिल पर बाँधने लगी।
रऊफ अपना खाली डिब्बा लेने आया था। उसने कहा, “गाड़ी में तुम्हारा भी चक्कर हो गया। भाड़े के सौ रुपये दे देना।”
देवकी ने उसकी ओर देखा। वह नजर नहीं चुरा रहा था। उसने सौ का नोट निकाल दिया।
घर जाने से पहले उसने कॉपी खोली। अगले खेत के नाम के नीचे जगह कम थी। उसने पन्ना पलटा और सबसे ऊपर लिखा—‘फूल हैं? पास में मधुमक्खियों के बक्से?’ फिर साइकिल की ढीली रस्सी दोबारा खींचकर बाँध दी।
Voice of Paws — Stray Insight Foundation के सहयोग से। यह मौलिक काल्पनिक कहानी है, वास्तविक घटना नहीं। सामग्री में AI की सहायता ली जा सकती है। चित्र AI द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र है।