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काल्पनिक कहानी: जाल की कटान

07 Nov 2026 · admin
सांकेतिक चित्र: काल्पनिक कहानी: जाल की कटान

मौलिक काल्पनिक कहानी — वास्तविक घटना नहीं।

फूलमती ने जाल का ऊपरी सिरा खींचा तो पानी के नीचे कोई भारी चीज उलट गई। उसने समझा, फिर ईंटों वाला बोरा फँसा है। तालाब के उस कोने में लोग मकान का मलबा डाल जाते थे। लेकिन अगली खींच पर पानी से चपटी नाक निकली, फिर चिकनी पीठ का गोल हिस्सा। कछुए के अगले पैर में कई फंदे कस गए थे। फूलमती ने रस्सा वहीं रोक लिया। दूसरे किनारे से बंसी चिल्लाया, “खींचो भी! गाड़ी वाला आठ बजे लौट जाएगा।”

कस्बे के पुराने तालाब में उस सुबह तीसरी बार जाल डाला गया था। ऊपर सड़क पर दूध की मोटरसाइकिलें निकल रही थीं। किनारे की चिकनी मिट्टी में मछली ढोने वाले टब धँसे थे। फूलमती घुटनों तक पानी में थी। उसने अपनी तरफ का बाँस तिरछा करके जाल का फँसा हिस्सा सतह के पास रखा। कछुआ गर्दन निकाल पा रहा था, मगर पैर चलाता तो फंदे और तन जाते।

“इधर आकर देखो,” उसने कहा।

बंसी ने अपनी ओर का रस्सा एक लड़के को दिया और पानी काटता आया। उसने जाल के नीचे झाँका। “अरे, इसे बाहर फेंक देंगे। पहले मछली घेर लो।”

“इसके साथ खींचेंगे तो जाल फटेगा।”

यह बात उसने पहले कही। दूसरी बात, कि कछुए का पैर कसता जा रहा था, वह अपने तक रख गई। बंसी को सुबह से तीन बार नुकसान का हिसाब सुनाते देखा था। तालाब का सालाना पट्टा उसके नाम था। इस बार पानी देर तक भरा रहने से मछली कम निकली थी और पट्टे की आखिरी किस्त अगले हफ्ते देनी थी।

फूलमती उसके यहाँ दिहाड़ी पर नहीं, हिस्से पर काम करती थी। जितनी मछली बिकती, उसमें से खर्च काटकर उसका हिस्सा निकलता। आज कम-से-कम सोलह सौ मिलने की उम्मीद थी। घर की कोठरी में वह मछली बेचती थी; नया पक्का चबूतरा बनवाना चाहती थी, ताकि ग्राहक उसे हमेशा नाली के पास बैठी औरत न समझें। राजमिस्त्री ने रविवार खाली रखा था।

बंसी ने झुककर एक गाँठ खींची। कछुए ने गर्दन पीछे की और अगला पैर जोर से चलाया। दोनों ने हाथ हटा लिए।

“किनारे तक ले चलें?” उसने पूछा।

फूलमती ने जाल की फैली थैली देखी। उसमें छोटी-बड़ी मछलियाँ चमक रही थीं। “पूरा खींचा तो दबेगा। यह हिस्सा ढीला करना पड़ेगा।”

जाल दो महीने पहले मरम्मत होकर आया था। बीच का नया टुकड़ा नीला था, बाकी धूप में सफेद पड़ गया था। फूलमती ने नीले हिस्से को पहचान लिया। उसी में फंदे उलझे थे।

सड़क से खरीदार का आदमी उतरा। उसने घड़ी देखी और टब गिनने लगा। “कितनी देर?”

“बस निकाल रहे हैं,” बंसी बोला।

“मुझे आगे बरुआ तालाब जाना है। वहाँ पूरी गाड़ी का माल है।”

फूलमती ने कहा, “रस्सा तनिक छोड़ो।”

ढील मिलते ही जाल का एक किनारा पानी में बैठ गया। कई छोटी मछलियाँ चमककर बाहर निकलीं। बंसी ने तुरंत रस्सा पकड़ लिया। “ऐसे तो सब निकल जाएँगी। तुम्हारा हिस्सा भी इसी में है।”

वह जानती थी। पिछली शाम उसने चबूतरे की ईंटें गिनकर अलग रखी थीं। बरसों बाद किसी काम के लिए पहले से पूरा पैसा जोड़ने वाली थी।

किनारे पर खड़ा लड़का बोला, “कछुआ बेच दो। बाजार में लेते होंगे।”

“जो नहीं जानते, वह मत बोल,” फूलमती ने कहा। फिर उसे अपना स्वर जरूरत से तेज लगा। “जा, मेरी थैली से फोन ले आ।”

तालाब पर पिछले महीने मत्स्य विभाग का आदमी आया था। उसने पंचायत के चौकीदार का नंबर लिखवाया था—पानी में कोई अजीब बीमारी या जंगली जीव मिले तो खबर देने के लिए। चौकीदार ने फोन पर पहले जगह पूछी, फिर कहा कि वन विभाग में सूचना कर देगा। कितनी देर लगेगी, वह नहीं बता सका।

खरीदार का आदमी ऊपर चढ़ गया। गाड़ी का इंजन चालू हो चुका था। बंसी ने फूलमती के पास आकर धीमे कहा, “मैंने तुम्हें कभी हिसाब में दबाया?”

“नहीं।”

“तो मेरा भी समझो। एक दिन की बात नहीं है। गाड़ी छूटी तो कल तक मछली कहाँ रखूँगा?”

फूलमती ने नजर उठाई। धूप तालाब के बीच पहुँच गई थी। किनारे रखे खाली टब अभी ठंडे थे, दो घंटे बाद नहीं रहते। उसने कहा, “इसे खोलने बैठेंगे तो देर और होगी। फंदे काट देते हैं।”

“नए टुकड़े में?”

वह चुप रही।

बंसी ने अपने गीले बाल पीछे किए। “मरम्मत आठ सौ से कम की नहीं। जो मछली निकली, सो अलग।”

“आधी कटान मेरी लिख लेना।”

उसके मुँह से निकलते ही रकम साफ हो गई—चार सौ। बाकी मछली कम निकली तो चबूतरे की मजदूरी भी पूरी न पड़ती। उसने यह नहीं जोड़ा कि कछुआ किसी ने जानकर नहीं फँसाया था और जाल अकेले उसका नहीं था। अभी कहती तो बात फिर वहीं अटक जाती।

बंसी ने लड़के से जाल सुधारने वाली कैंची मँगाई। दोनों ने पास के उथले हिस्से में जाल को ढीला टिकाया। फूलमती दूर से फंदों की दिशा बताती रही और बंसी ने हाथ गर्दन से दूर रखकर ऊपर की डोरियाँ काटीं। एक जगह काटने पर दूसरी गाँठ खुली नहीं; उसे भी काटना पड़ा।

आखिरी फंदा ढीला हुआ तो कछुआ कुछ क्षण स्थिर रहा। फिर उसने पैर फैलाए और गहरे पानी की ओर सरक गया। फूलमती को बस पीठ का किनारा दिखा। बंसी ने उसी समय कटा जाल उठाकर बंद किया। “अब खड़े मत रहो,” उसने कहा। दोनों फिर मछली समेटने लगे।

गाड़ी चली गई थी। बची मछली बंसी की साइकिल और किराए के रिक्शे पर कस्बे पहुँची। बड़े खरीदार के बजाय तीन दुकानों पर माल बाँटना पड़ा; कहीं भाव कम मिला, कहीं पैसे शाम को देने की बात हुई। फूलमती दोपहर तक तराजू पकड़ती रही। उसकी हथेलियों में जाल की डोरियों के लाल निशान थे।

हिसाब में उसका हिस्सा ग्यारह सौ चालीस निकला। बंसी ने चार सौ काटकर सात सौ चालीस बढ़ाए। उसने नोट लिए। फिर हिसाब की कॉपी अपनी ओर खिसकाई और कटान के सामने लिखी पूरी रकम देखी। आठ सौ ही थी। उसने कॉपी लौटा दी।

घर पहुँचकर उसने राजमिस्त्री को कहलवा दिया कि रविवार को न आए। ईंटों पर पुरानी बोरी डाल दी। शाम को चौकीदार का फोन आया तो उसने बताया कि कछुआ पानी में चला गया था। उसने जगह फिर पूछी और बात खत्म हो गई।

अँधेरा होने से पहले बंसी कटा जाल लेकर आया। बाजार का कारीगर दो दिन बाद हाथ लगाता; सोमवार की खींच रुक जाती। फूलमती चौखट पर बैठ गई और अपनी जाल वाली सुई निकाल लाई।

बंसी ने नीला टुकड़ा फैलाया। फूलमती ने पहले कटे किनारों को बराबर किया, फिर डोरी पिरोई। नई गाँठ बाँधने से पहले दोनों ने अपनी-अपनी तरफ का जाल थोड़ा ढीला छोड़ दिया।

Voice of Paws — Stray Insight Foundation के सहयोग से। यह मौलिक काल्पनिक कहानी है, वास्तविक घटना नहीं। सामग्री में AI की सहायता ली जा सकती है। चित्र AI द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र है।



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