मौलिक काल्पनिक कहानी — वास्तविक घटना नहीं।
जमुना ने पालक की क्यारी से काली बकरी को हाँका तो वह दो छलाँग में टमाटर की पौध पर जा पहुँची। गीली मिट्टी में उसके खुर धँसे और बाँस की पतली खपच्चियाँ गिर गईं। पीछे दो छोटी बकरियाँ थीं। जमुना ने डंडा जमीन पर पटका, फिर उसे फेंककर कुएँ की ओर जाने वाला रास्ता रोक लिया। बकरियाँ मुड़ीं और खाली क्यारी में सिमट गईं। सड़क पर साइकिल की घंटी बजी। स्कूल की रसोइया सकीना अपना टिफिन हैंडल पर लटकाए उतर रही थी।
“तुम्हारी हैं?” जमुना की आवाज ऊँची थी। सकीना ने साइकिल पीपल से टिकाई। “हाँ। सुबह खूंटे पर थीं।” उसने काली बकरी को पुकारा। बकरी आगे बढ़ी, मगर जमुना बीच में आ गई। “पहले यह देखो। पौध कोई घास है?”
सकीना उकड़ूँ बैठ गई। कुछ पौधे जड़ समेत निकले थे, कुछ केवल झुके थे। उसने एक सीधा करना चाहा तो जमुना बोली, “अब हाथ मत लगाओ।” सकीना ने मिट्टी लगी उँगलियाँ अपनी चप्पल के पास झाड़ दीं।
कस्बे के आखिरी मकानों के पीछे यह छह बिस्वा जमीन जमुना ने साल भर के पट्टे पर ली थी। पहले वह दूसरों के खेत में पौध उखाड़ती थी; अब मेड़ पर उसका अपना नाम लिखा टीन टँगा था। अगले सोमवार हाट में टमाटर की पौध बेचनी थी। उसी रकम से पट्टे की बची किस्त जाती। मालिक ने साफ कहा था—पैसा देर से आया तो अगली बार जमीन दूसरे को मिलेगी।
जमुना ने तीनों बकरियों को खाली पड़े पुराने दड़बे में कर दिया। दरवाजे की जाली बंद की, भीतर की सूखी मिट्टी पर पानी की बाल्टी रखी। काली बकरी जाली सूँघकर पत्तियों की ओर गर्दन बढ़ाने लगी।
“पैसे देकर ले जाना,” जमुना ने कहा।
“कितने?”
उसने क्यारी पर निगाह डाली। “बारह सौ।”
सकीना ने होंठ भींचे। “मेरी पूरे महीने की रसोई की मजदूरी दो हजार है। वह भी पिछले महीने की बाकी है।”
“तो मेरा नुकसान किस महीने आएगा?”
दोपहर तक खबर चाय की दुकान पहुँच गई। पास के खेत वाला महावीर आया। वह अपने को बीच-बचाव का आदमी मानता था, हालांकि दोनों से उसकी उधारी चलती थी। उसने टूटी पौध देखी, फिर खेत की तार-जाली के साथ चलता हुआ सड़क की तरफ गया।
वहाँ जाली का निचला कोना बाँस से खुला पड़ा था। मिट्टी पर छोटे खुरों के निशान थे। “यहीं से आई हैं,” उसने कहा। जमुना ने जवाब नहीं दिया। पिछली शाम खाद की ठेली भीतर लाने के लिए उसी ने तार खोला था। अँधेरा होने पर ऊपर का फंदा चढ़ा दिया; नीचे का सिरा ईंट से दबाना भूल गई थी।
“लेकिन बकरियाँ खुली क्यों थीं?” उसने पूछा।
सकीना ने बताया कि उसकी बूढ़ी सास रस्सियाँ खोलकर उन्हें घर के पीछे चराने ले गई थीं। एक बकरी झाड़ी की तरफ गई तो बाकी भी निकल गईं। “अम्मा अब तेज चल नहीं पातीं। मैं स्कूल में थी।”
महावीर ने मूँछ के किनारे दबाए। “नुकसान तो हुआ है। आठ सौ पर बात करो।”
आठ सौ सुनकर जमुना को राहत हुई। उसने बारह सौ बिना गिने कहा था। सुबह का गुस्सा, पट्टे का डर और अपनी क्यारी में किसी दूसरे का पशु—सब एक रकम बन गए थे। उसने हामी भरने के लिए मुँह खोला ही था कि सकीना बोली, “पहले पौधे गिन लो।”
जमुना तमतमा गई। “मैं झूठ बोल रही हूँ?”
“मैंने यह कब कहा? जो बच जाए, उसका भी पैसा दूँ?”
महावीर को दुकान खोलनी थी। उसने जाते हुए कहा, “शाम तक निपटा लेना। पशु बाँधकर रखने से रोज नया झगड़ा होगा।”
जमुना का सत्रह बरस का बेटा मोहन कॉलेज से लौटा तो उसने चुपचाप गिरी खपच्चियाँ उठाईं। घर में कई दिनों से पुरानी साइकिल खरीदने की बात चल रही थी। बस छूट जाए तो उसके दो पीरियड निकल जाते थे। जमुना ने कहा था कि पौध अच्छे भाव बिकी तो देखेंगे।
“सब खत्म?” उसने पूछा।
“तू पहले यह सीधा कर।”
दोनों क्यारी के पास बैठ गए। नम मिट्टी में कई जड़ें सलामत थीं। मोहन उँगली से छेद करता, जमुना पौधा बैठाकर मिट्टी दबा देती। पालक ज्यादा गई थी; टमाटर की पहली पंक्ति में खाली जगहें साफ दिखती थीं। उन्होंने खराब पौधे अलग तसले में रखे।
शाम को सकीना कपड़े की गाँठ लेकर आई। उसमें तीन सौ रुपये थे। “इतने अभी हैं। बाकी मजदूरी मिलने पर। बकरियाँ दे दो। घर में बच्ची अकेली है।”
मोहन ने तसले की ओर देखा। जमुना ने उसे आँख से चुप कराया, मगर सकीना देख चुकी थी। “बस इतने मरे हैं?”
“जो लगाए हैं, वे सब बचेंगे, यह भी नहीं पता।”
“ठीक है। दो दिन बाद फिर देख लेना।”
जमुना को यह बात और बुरी लगी। हिसाब अब उसके कह देने से तय नहीं होता था। उसने तीन सौ लिये, पर बकरियाँ छोड़ने के बजाय गाँठ फिर खोल दी। नोट अपने घुटने पर रखकर बोली, “परसों आना। जो सूखेंगे, वे भी गिनेंगे। लेकिन जाली का कोना मैंने खुला छोड़ा था।”
मोहन ने सिर उठाया। सकीना कुछ देर उसे देखती रही। फिर बोली, “खुला खेत देखकर बकरी हिसाब तो नहीं करेगी। मेरी तरफ से भी ढील हुई।”
“आधा नुकसान तुम्हारा। आधा मेरा,” जमुना ने कहा। शब्द निकलते ही उसे सोमवार की किस्त याद आई। उसने नोट फिर गिने और दो सौ वापस बढ़ा दिए।
परसों तक कुछ और पौधे बैठ गए। दोनों औरतों ने साथ गिने। बीज, खाद और बिकने लायक बची पौध का जोड़ लगाने पर सकीना के हिस्से दो सौ चालीस रुपये आए। सौ मिल चुके थे। बाकी उसने स्कूल की मजदूरी मिलने पर देने को कहा। जमुना ने पुरानी कॉपी में रकम लिखी और नीचे सकीना से निशान लगवा लिया।
पट्टे की किस्त पूरी नहीं हुई। जमुना ने घर के खर्च से रखे पैसे निकाले और मोहन को बताया कि साइकिल अभी नहीं आएगी। उसने नाराज होकर कहा, “पहले मुझे ही क्यों बताते हो कि खरीद देंगे?” इस बार जमुना ने उसे समझदार बनने को नहीं कहा। कॉपी बंद करके रख दी।
रविवार को सकीना एक छोटा गठ्ठर पतली बल्लियों का लाई। पुराने मुर्गीखाने से निकली थीं। दोनों ने सड़क की तरफ जाली के नीचे उन्हें गाड़ा। गाँठ कसते समय सकीना बोली, “रस्सी छोटी कर दूँगी। अम्मा घर के पीछे ही चराएँगी।”
मोहन पानी लेकर आया तो जमुना ने उससे बड़ी ईंट माँगी। उसने टूटी ईंट बढ़ाई। जमुना ने सिर हिलाया। वह ढेर में से पूरी ईंट छाँट लाया और जाली का निचला सिरा उठाकर उसके नीचे जमा दिया। फिर दोनों हाथों से खींचकर देखा।
Voice of Paws — Stray Insight Foundation के सहयोग से। यह मौलिक काल्पनिक कहानी है, वास्तविक घटना नहीं। सामग्री में AI की सहायता ली जा सकती है। चित्र AI द्वारा निर्मित सांकेतिक चित्र है।