जानकारीपरक फीचर — यह नई या ब्रेकिंग घटना की रिपोर्ट नहीं है। कैद किसी नेता को सार्वजनिक जीवन से दूर कर सकती है, लेकिन क्या उसकी राजनीतिक पहचान को भी रोक सकती है? नेल्सन मंडेला की जीवनयात्रा में इसका उलटा दिखाई देता है। नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित जीवनी बताती है कि जेल के वर्षों में उनकी प्रतिष्ठा लगातार बढ़ी और वह दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरोध का सशक्त प्रतीक बन गए।
संगठन से संघर्ष तक की राह
18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसकेई में जन्मे मंडेला ने फोर्ट हेयर और विटवाटरस्रैंड विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की तथा कानून का अध्ययन किया। वर्ष 1944 में वह अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यानी एएनसी से जुड़े। 1948 के बाद सत्तारूढ़ नेशनल पार्टी की रंगभेद नीतियों के विरुद्ध उनका संघर्ष आगे बढ़ा।
यह यात्रा लगातार एक जैसी नहीं रही। 1956 से 1961 तक चले राजद्रोह मुकदमे में वह बरी हुए। इस बीच 1960 में एएनसी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद मंडेला ने संगठन के भीतर सैन्य शाखा बनाने की वकालत की। जून 1961 में एएनसी नेतृत्व ने तय किया कि उनके अभियान में शामिल होने के इच्छुक सदस्यों को रोका नहीं जाएगा। इसी क्रम में उमखोंतो वे सिजवे का गठन हुआ।
कैद बढ़ी, लेकिन प्रभाव घटा नहीं
1962 में गिरफ्तारी के बाद मंडेला को कठोर श्रम के साथ पांच वर्ष की कैद हुई। बाद में अन्य नेताओं के साथ उन पर हिंसा के जरिए सरकार गिराने की साजिश का मुकदमा चला। 12 जून 1964 को मंडेला समेत आठ अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
1964 से 1982 तक वह केप टाउन के पास रॉबेन द्वीप की जेल में रहे; इसके बाद उन्हें मुख्य भूमि पर स्थित पोल्समूर जेल में रखा गया। नोबेल की जीवनी के अनुसार, इसी कैद के दौरान उनकी पहचान दक्षिण अफ्रीका के प्रमुख अश्वेत नेता के रूप में मजबूत होती गई। उन्होंने रिहाई पाने के लिए अपने राजनीतिक रुख से समझौता करने से लगातार इनकार किया।
रिहाई के बाद संगठन में वापसी
11 फरवरी 1990 को मंडेला रिहा हुए और फिर अपने पुराने राजनीतिक लक्ष्यों के लिए सक्रिय हो गए। वर्ष 1991 में, प्रतिबंध लगने के बाद दक्षिण अफ्रीका के भीतर आयोजित एएनसी के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें संगठन का अध्यक्ष चुना गया। उनके पुराने सहयोगी ओलिवर टैम्बो राष्ट्रीय चेयरपर्सन बने।
इस जीवनक्रम की खास बात केवल लंबी कैद नहीं है। यह उस प्रक्रिया को भी दिखाता है जिसमें सार्वजनिक मंच से दूर रखा गया नेता व्यापक प्रतिरोध का प्रतीक बनता गया—और रिहाई के बाद फिर संगठित राजनीतिक जिम्मेदारी में लौटा।
स्रोत
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