आर्थिक शोध संस्थान जीटीआरआई (GTRI) ने भारत को आरसीईपी (RCEP) में शामिल होने पर पुनर्विचार करने के विश्व बैंक के सुझाव को त्रुटिपूर्ण मान्यताओं पर आधारित बताया था। 4 सितंबर 2024 के इस घटनाक्रम में संस्थान ने समझौते के आर्थिक लाभ, आयात में वृद्धि और चीन के साथ सदस्य देशों के व्यापार घाटे को लेकर सवाल उठाए थे।
विश्व बैंक ने क्या सुझाव दिया था
विश्व बैंक ने अपनी ‘इंडिया डेवलपमेंट अपडेट’ रिपोर्ट में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए भारत को आरसीईपी पर फिर विचार करने का सुझाव दिया था। इसके जवाब में जीटीआरआई ने उन मान्यताओं पर आपत्ति जताई, जिनके आधार पर समझौते से भारत को लाभ मिलने का आकलन किया गया था।
जीटीआरआई का कहना था कि अध्ययन में बताए गए अनुमानित आय लाभ को निर्यात बढ़ने के लाभ के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। संस्थान के अनुसार, ये अनुमान मुख्य रूप से आयात में वृद्धि से जुड़े हैं, न कि निर्यात में बढ़ोतरी से। उसकी आपत्ति लाभ के अनुमान और उनके आधार, दोनों को लेकर थी।
चीन के साथ व्यापार घाटे का दिया हवाला
जीटीआरआई के अनुसार, आरसीईपी लागू होने के बाद आसियान और जापान जैसे सदस्य देशों का चीन के साथ व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा है। संस्थान ने सदस्य देशों के इस अनुभव को भारत के लिए दिए गए सुझाव पर अपनी आपत्ति का एक आधार बनाया था।
थिंक टैंक का मानना था कि आरसीईपी के आर्थिक लाभ चीन के पक्ष में अत्यधिक झुके हुए हैं। उसके आकलन में सदस्य देशों के लिए लाभ की चर्चा करते समय चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे और आयात की भूमिका को ध्यान में रखना जरूरी है।
2019 में बाहर रहने का भारत का फैसला
भारत ने 2019 में व्यापार असंतुलन और घरेलू हितों की सुरक्षा के आधार पर आरसीईपी समझौते से बाहर रहने का निर्णय लिया था। विश्व बैंक का सुझाव इसी फैसले पर पुनर्विचार करने से संबंधित था।
यह बहस सितंबर 2024 की है, न कि किसी नए घटनाक्रम की। इसमें विश्व बैंक ने व्यापार और निवेश बढ़ाने की संभावना पर जोर दिया था, जबकि जीटीआरआई ने संभावित लाभ के आकलन और व्यापार संतुलन से जुड़ी चिंताएं सामने रखी थीं।
स्रोत
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